अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन एक बार फिर एच-1बी वीजा कार्यक्रम में बड़े बदलाव की ओर बढ़ रहा है। पहले जहां 100,000 मिलियन डॉलर का अनिवार्य शुल्क प्रस्तावित किया गया था. अब वे नौकरी दाताओं के माध्यम से परमिट के उपयोग और इसकी योग्यता और नियोक्ताओं की जिम्मेदारी से संबंधित नियमों को लागू करने के लिए तैयार हैं।
बड़े बदलावों की रूपरेखा
इस नए प्रस्ताव में कई प्रशासन संबंधी और तकनीकी सुधार शामिल हैं। इनमें कैप छूट के लिए पात्रता मानकों में बदलाव, वीजा शर्तों का उल्लंघन करने वाले नियोक्ताओं के सत्यापन को कड़ा करना, तीसरे पक्ष की नियुक्तियों की अधिक निगरानी करना और पारदर्शिता सुनिश्चित करना जैसी चीजें शामिल हैं। डीएचएस का कहना है कि एच-1बी कार्यक्रम की अखंडता बनाए रखने और अमेरिकी कर्मचारियों के वेतन और कामकाजी परिस्थितियों की सुरक्षा के लिए यह कदम जरूरी है।
कब लागू होगा नया नियम?
मिली जानकारी के मुताबिक यह नया नियम दिसंबर 2025 में लागू हो सकता है. इस बीच ट्रंप प्रशासन वेज-आधारित चयन प्रणाली लाने पर भी विचार कर रहा है. इसे पारंपरिक लॉटरी सिस्टम की जगह लागू किया जा सकता है. इससे अधिक वेतन वाले आवेदकों को प्राथमिकता मिलेगी।
भारतीय पेशेवरों पर प्रभाव
इन नए नियमों का सबसे बड़ा असर भारत और चीन के युवा पेशेवरों पर पड़ सकता है, जो अमेरिकी तकनीक और चिकित्सा उद्योग में बड़ी संख्या में हैं। 2023 में स्वीकृत H-1B वीजा में से लगभग 74% भारतीय नागरिकों के लिए थे। और उनमें से ज्यादातर कंप्यूटर और आईटी क्षेत्र में हैं।
छूट निकायों पर प्रभाव
फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों और गैर-लाभकारी स्वास्थ्य संस्थानों से छूट की सीमा सीमित होगी या नहीं। अगर ऐसा हुआ तो शिक्षा, शोध और स्वास्थ्य क्षेत्र पर गंभीर असर पड़ सकता है.
नियोक्ताओं की जिम्मेदारी बढ़ेगी
अमेरिकी कानून के मुताबिक, एच-1बी वीजा पर अमेरिकी कर्मचारियों के बराबर या उससे अधिक वेतन मिलना चाहिए, लेकिन प्रशासन को संदेह है कि कई कंपनियां इन नियमों का पालन नहीं करती हैं। नए प्रस्ताव में कंपनियों की वेतन रिपोर्टिंग और पारदर्शिता के मानकों को सख्त करने की बात कही गई है।
संभावित परिणाम
यदि एच-1बी वीजा संबंधी सुधार लागू किया जाता है तो वीजा प्रक्रिया अधिक महंगी हो सकती है और शुल्क 100,000 डॉलर तक पहुंच सकता है। छूट वाली संस्थाओं पर प्रतिबंध से शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र पर असर पड़ेगा। वीजा मंजूरी में देरी और जांच लंबी खिंच सकती है। भारत से वीज़ा आवेदनों की संख्या घटने की संभावना है।