आंदोलन और त्रासदी
8 सितंबर को ‘जेन-जेड’ आंदोलन के दौरान हालात बेकाबू हो गए. पहले ही दिन पुलिस फायरिंग में 19 छात्रों की मौत हो गई. इसके बाद अगले दिन इलाज के दौरान अन्य 8 छात्रों की जान चली गई। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया और लोगों में आक्रोश फैल गया। छात्रों की मौत के बाद पूरे देश में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए और सरकार पर पीड़ित परिवारों को न्याय और वित्तीय सहायता प्रदान करने का दबाव बढ़ता गया।
कैबिनेट की पहली बैठक में बड़ा फैसला
प्रधानमंत्री बनने के बाद बालेन शाह की अध्यक्षता में हुई पहली कैबिनेट बैठक में इस मुद्दे को प्राथमिकता दी गई. बैठक में फैसला लिया गया कि आंदोलन में जान गंवाने वाले छात्रों के परिजनों को सरकारी नौकरी दी जाएगी. सरकार ने इस फैसले को सिर्फ घोषणा तक ही सीमित नहीं रखा है, बल्कि इस पर तत्काल अमल भी शुरू कर दिया है. यह कदम सरकार की प्रतिबद्धता को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। नेपाल विद्युत प्राधिकरण ने इस निर्णय के कार्यान्वयन के लिए एक आधिकारिक सूचना जारी की है। 27 छात्रों के करीबी रिश्तेदारों की सूची जारी की गई है. इस सूची के अनुसार उन्हें उनकी योग्यता और क्षमता के आधार पर उनके ही जिले में नौकरी दिए जाने का प्रस्ताव है। परिवार के सदस्यों को 35 दिनों के भीतर अपने रिश्ते का सबूत जमा करना होगा। इसके बाद उन्हें उचित पद पर नियुक्त किया जाएगा.
राजनीतिक संदेश और प्रतिबद्धता
यह फैसला राजनीतिक तौर पर भी काफी अहम माना जा रहा है. बालेन शाह ने चुनाव के दौरान वादा किया था कि सरकार आंदोलन में जान गंवाने वाले छात्रों के परिवारों की मदद के लिए कदम उठाएगी. अब सत्ता में आने के बाद उन्होंने अपना वादा पूरा कर कड़ा संदेश दिया है. यह कदम सरकार की विश्वसनीयता बढ़ाने में मदद कर सकता है और लोगों में यह विश्वास पैदा कर सकता है कि सरकार न केवल वादे करती है, बल्कि उन्हें लागू भी करती है।
विपक्ष की प्रतिक्रिया
इस फैसले की जहां एक तरफ तारीफ हो रही है वहीं दूसरी तरफ विपक्ष और कुछ सामाजिक संगठनों ने इस पर सवाल उठाए हैं. उनका मानना है कि सिर्फ नौकरी देना ही काफी नहीं है, बल्कि इस घटना के लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करना भी जरूरी है. उनके मुताबिक न्याय के लिए जिम्मेदारी तय करना और दोषियों को सजा देना सरकार की मुख्य जिम्मेदारी है.
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