ईरान के बारे में डोनाल्ड ट्रंप की ताज़ा चेतावनी से अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में हड़कंप मच गया है। कच्चे तेल की कीमतें 106 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं, जिससे एक बार फिर दुनिया भर में आर्थिक मंदी की आशंका बढ़ गई है। इस संदर्भ में इतिहास की सबसे भीषण महामंदी को समझना जरूरी है.
प्रारंभ और ‘काला मंगलवार’
विश्व की सबसे बड़ी आर्थिक मंदी 1929 में अमेरिका से शुरू हुई। 29 अक्टूबर 1929 को, जिसे ‘ब्लैक ट्यूज़डे’ के नाम से जाना जाता है, अमेरिकी शेयर बाज़ार बुरी तरह ढह गया। कुछ ही घंटों में अरबों डॉलर डूब गए और यह वित्तीय संकट तेजी से दुनिया भर में फैल गया, जो एक दशक तक चला।
अमेरिका और जर्मनी पर असर
इस मंदी की सबसे ज्यादा मार अमेरिका पर पड़ी. देश की जीडीपी 30% गिर गई और बेरोजगारी दर 25% तक पहुंच गई। हजारों बैंकों के पतन से लोगों की बचत ख़त्म हो गई। दूसरी ओर, जर्मनी की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई थी। आर्थिक अस्थिरता और गरीबी के कारण जर्मनी में एडॉल्फ हिटलर और नाजी पार्टी का उदय हुआ।
ब्रिटेन और अन्य देशों में स्थिति
अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर निर्भरता के कारण ब्रिटेन के निर्यात में तेजी से गिरावट आई और बेरोजगारी तेजी से बढ़ी। कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश, जो कृषि उत्पादों पर निर्भर थे, वहां कीमतों में 60% की गिरावट से किसान तबाह हो गए।
भारत पर महामंदी का प्रभाव
उस समय भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था। वैश्विक मांग में गिरावट के कारण भारत के निर्यात में भी बड़ी गिरावट दर्ज की गई। ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों को फसलों के बहुत कम दाम मिल रहे थे, जिसके कारण ग्रामीण ऋण और आर्थिक कठिनाइयाँ काफी हद तक बढ़ गईं। यह ऐतिहासिक घटना साबित करती है कि कैसे वैश्विक तनाव आम आदमी से उसकी आजीविका छीन सकता है। कच्चे तेल की मौजूदा बढ़ती कीमतें दुनिया को एक बार फिर ऐसे ही संकट की ओर धकेलती नजर आ रही हैं।