ईरान और अमेरिका-इजराइल के बीच तनातनी ने अब नया और खतरनाक रूप ले लिया है. सप्ताहांत में रणनीतिक ईरानी तेल डिपो पर हवाई हमले के बाद कई इलाकों में ‘काली बारिश’ होने की खबरें आ रही हैं। यह बारिश सिर्फ पानी नहीं है, बल्कि वायुमंडल में घुले जहरीले रसायनों और धुएं का घातक मिश्रण है, जिसने वैज्ञानिकों और पर्यावरणविदों की चिंता बढ़ा दी है।
काली बारिश क्यों हो रही है?
वैज्ञानिकों के मुताबिक, तेल डिपो में लगी भीषण आग से लाखों टन धुआं, अदृश्य हाइड्रोकार्बन और PM2.5 जैसे बारीक कण वायुमंडल में फैल गए हैं। जब बारिश होती है, तो ये बूंदें वायुजनित प्रदूषकों को अपने साथ जमीन पर खींच ले जाती हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, बारिश का पानी काला और चिपचिपा होता है, जिससे वाहनों और इमारतों पर तेल जैसी परत बन जाती है।
घातक रसायनों का मिश्रण
इस बारिश में न केवल एसिड, बल्कि कार्सिनोजेनिक रसायन होने की आशंका है जो कैंसर का कारण बन सकते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक इसमें ये खतरनाक तत्व हो सकते हैं। पीएएच (पॉलीसाइक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन): जिन्हें अत्यधिक विषैला और कैंसरकारी माना जाता है। तेल के दहन से निकलने वाला सल्फर और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड हवा में मिल जाता है और अम्लीय वर्षा बनाता है। विस्फोटों में नष्ट हुई सैन्य संरचनाओं और इमारतों से निकले अकार्बनिक यौगिक।
सेहत पर गंभीर असर
ईरान की रेड क्रिसेंट सोसायटी ने लोगों को बारिश में बाहर न निकलने की सलाह दी है. इस बारिश के बाद कई लोगों ने सिरदर्द, सांस लेने में दिक्कत और त्वचा में जलन की शिकायत की है. जमीन में रिसने वाला यह प्रदूषित पानी लंबे समय में कृषि और पेयजल स्रोतों को भी प्रदूषित कर सकता है।
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