हीलियम गैस सिर्फ गुब्बारे भरने के लिए नहीं है, बल्कि यह आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी की रीढ़ है। रॉकेट लॉन्चिंग से लेकर अस्पतालों में एमआरआई स्कैन तक, इस गैस के बिना कई महत्वपूर्ण कार्य रुक सकते हैं। मध्य पूर्व में मौजूदा तनाव ने हीलियम आपूर्ति श्रृंखला को बाधित कर दिया है, जिससे भारत जैसे आयात पर निर्भर देशों के लिए एक बड़ी चुनौती पैदा हो गई है।
हीलियम साम्राज्य का स्वामी कौन है?
विश्व में हीलियम के उत्पादन में अमेरिका (USA) निर्विवाद राजा है। विश्व की कुल हीलियम आवश्यकता का 40% से अधिक उत्पादन अकेले अमेरिका करता है। अमेरिका के बाद कतर और रूस भी इस लिस्ट में हैं, लेकिन सबसे ज्यादा दबदबा अमेरिका का है। हीलियम की खोज 1868 में सूर्य की किरणों के अध्ययन के दौरान की गई थी, इसलिए पृथ्वी पर इसकी खोज से पहले इसे अंतरिक्ष में खोजा गया था।
भारत की स्थिति एवं आवश्यकता
भारत के लिए स्थिति थोड़ी चिंताजनक है क्योंकि देश में हीलियम का घरेलू उत्पादन लगभग नगण्य है। भारत में हर साल लगभग 65.66 मिलियन क्यूबिक मीटर हीलियम की खपत होती है, जिसके लिए विदेशी आयात पर हर साल लगभग 55,000 करोड़ रुपये का खर्च आता है। यह एक बड़ी रकम है जो विदेशी मुद्रा पर बोझ डालती है।
महत्व एवं उपयोग
हीलियम का उपयोग अत्यधिक संवेदनशील क्षेत्रों में किया जाता है। अस्पतालों में एमआरआई मशीनों को ठंडा रखने के लिए तरल हीलियम अपरिहार्य है। इसके अलावा रॉकेट लॉन्चिंग, परमाणु रिएक्टर और सेमीकंडक्टर चिप्स के निर्माण में इसका बड़ा योगदान है। इस गैस के बिना इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग जीवित नहीं रह सकता।
आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ते कदम
भारत ने आयात कम करने की कोशिशें तेज कर दी हैं. हाल ही में आईआईटी बॉम्बे ने तरल हीलियम बनाने की सुविधा शुरू की है। झारखंड के राजमहल ज्वालामुखी बेसिन में बड़े पैमाने पर हीलियम भंडार होने की संभावना है। भारत में लगभग 150 गर्म झरने हैं जिनसे हीलियम निकाला जा सकता है। अगर सरकार इन प्राकृतिक स्रोतों से गैस निकालने की तकनीक पर काम करे तो भारत हीलियम के मामले में आत्मनिर्भर बन सकता है।