मध्य पूर्व में जारी संघर्ष ने अब एक नया और बेहद खतरनाक मोड़ ले लिया है। जो युद्ध अब तक लेबनान, गाजा और सीरिया तक ही सीमित लग रहा था, वह अब भौगोलिक सीमाओं को पार कर कैस्पियन सागर तक पहुंच गया है। इजराइल ने पहली बार कैस्पियन सागर में ऑपरेशन को अंजाम देते हुए रूस और ईरान के बीच सबसे महत्वपूर्ण हथियार आपूर्ति लाइन पर बड़ा हमला किया है। यह हमला सिर्फ एक सैन्य कार्रवाई नहीं है, बल्कि वैश्विक स्तर पर एक बड़ा रणनीतिक संदेश है।
कैस्पियन सागर क्यों महत्वपूर्ण है?
कैस्पियन सागर दुनिया का सबसे बड़ा अंतर्देशीय जल निकाय है और इसे लंबे समय से रूस और ईरान के लिए ‘सुरक्षित गलियारे’ के रूप में जाना जाता है। चूंकि यह इलाका अमेरिकी नौसेना की पहुंच से बाहर है, इसलिए दोनों देश बिना किसी अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप के यहां से हथियारों की तस्करी करते थे। रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस रास्ते से 3 लाख से ज्यादा तोपखाने के गोले और करीब 10 लाख राउंड गोला-बारूद रूस भेजे गए थे. खास तौर पर ईरान के ‘शहीद’ ड्रोन, जिनका इस्तेमाल रूस यूक्रेन के खिलाफ कर रहा है, की सप्लाई इसी रास्ते से की गई थी.
हमले की गंभीरता और क्षति
इजराइल ने ईरान के कैस्पियन तट पर रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण अंजाली बंदरगाह पर कई मिसाइलें दागीं। हमलों में ईरानी नौसैनिक कमांड सेंटर, शिपयार्ड, मरम्मत सुविधाओं और कई युद्धपोतों को निशाना बनाया गया। उपग्रह चित्रों और दृश्य साक्ष्यों से पता चलता है कि हमले ने नौसेना के बुनियादी ढांचे को व्यापक नुकसान पहुंचाया और कई जहाजों को नष्ट कर दिया।
रूस-ईरान गठबंधन को ख़त्म करने का प्रयास
इस हमले ने रूस और ईरान के बीच घनिष्ठ सैन्य गठबंधन को उजागर कर दिया। रूस ईरान को सैटेलाइट इंटेलिजेंस और उन्नत ड्रोन तकनीक मुहैया करा रहा था, जिसके बदले में ईरान उसे गोला-बारूद मुहैया करा रहा था। इज़राइल के इस कदम से न केवल हथियारों की आपूर्ति प्रभावित होगी, बल्कि आर्थिक लेनदेन भी प्रभावित होगा, क्योंकि इस मार्ग का उपयोग गेहूं और अन्य आवश्यक वस्तुओं के व्यापार के लिए भी किया जाता था।
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