मिसाइलों और तेल की आग से होने वाला प्रदूषण श्वसन रोगों सहित गंभीर स्वास्थ्य खतरों का कारण बन रहा है।
तेल डिपो और रिफाइनरियों को निशाना बनाना
ईरान में चल रहे युद्ध का न केवल सैन्य और राजनीतिक स्तर पर बल्कि पर्यावरण और लोगों के स्वास्थ्य पर भी गंभीर असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि इस युद्ध के कारण होने वाले जहरीले प्रदूषण का असर दशकों तक रह सकता है। इज़रायली ड्रोन हमलों ने शहर के बाहर प्रमुख तेल डिपो और रिफाइनरियों को निशाना बनाया। इन हमलों के बाद, तेल जल गया, जिससे आकाश में काले धुएं का बड़ा गुबार फैल गया। बाद में धुआं बारिश के बादलों के साथ मिल गया और शहर पर बरसने लगा।
प्रदूषण के घातक प्रभाव
ब्रिटेन की ब्रैडफोर्ड यूनिवर्सिटी में केमिकल और पेट्रोलियम इंजीनियरिंग के प्रोफेसर नेजत रहमानियन ने कहा कि इस घटना ने उन्हें 35 साल पहले की याद दिला दी। खाड़ी युद्ध के दौरान इराकी सेना ने कुवैत में सैकड़ों तेल के कुओं में आग लगा दी। उस आग का धुआं 1,290 किलोमीटर तक फैला और ईरान तक पहुंच गया. धुएं में कालिख, हाइड्रोकार्बन और सल्फर डाइऑक्साइड जैसे खतरनाक पदार्थ थे। 2018 के एक अध्ययन के अनुसार, इस प्रदूषण ने हिमालय के ग्लेशियरों के पिघलने में भी तेजी ला दी।
तेहरान ख़तरे में क्यों है?
वैज्ञानिकों का कहना है कि तेहरान पहले से ही गंभीर प्रदूषण का सामना कर रहा है। शहर की हवा और पानी में सीसा, कैडमियम, क्रोमियम और निकल जैसी भारी धातुएँ पाई गई हैं। इसके अलावा, जीवाश्म ईंधन और अपशिष्ट जलाने से सल्फर डाइऑक्साइड भी पाया गया है। तेहरान अल्बोर्ज़ पर्वत की तलहटी में स्थित है। पर्वत वायु संचार को कम कर देते हैं। जो लंबे समय तक शहर में प्रदूषण को रोके रखता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि युद्ध ख़त्म होने के बाद प्रदूषण का सटीक आकलन करना और उसे साफ़ करना महत्वपूर्ण होगा.
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