भारत ने अपने जल संसाधनों के अधिकतम उपयोग की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। लंबे समय से पाकिस्तान की ओर बह रहा रावी नदी का अधिशेष पानी अब पंजाब और जम्मू-कश्मीर के सूखे खेतों की प्यास बुझाएगा। पंजाब-जम्मू-कश्मीर सीमा पर ‘शाहपुर कंडी बांध’ का काम अब पूरा होने वाला है, जो अगली गर्मियों में पाकिस्तान के लिए परेशानी खड़ी कर सकता है।
यह परियोजना क्यों महत्वपूर्ण है?
सिंधु जल संधि के अनुसार, पूर्वी नदियों रावी, ब्यास और सतलज के पानी पर भारत का पूरा अधिकार है। हालाँकि, तकनीकी बुनियादी ढांचे की कमी के कारण अब तक रावी नदी का अतिरिक्त पानी माधोपुर के रास्ते सीधे पाकिस्तान जा रहा था। जम्मू-कश्मीर के मंत्री जावेद अहमद राणा के मुताबिक, शाहपुर कंडी बांध के चालू होने से यह प्रवाह रुक जाएगा। इस बदलाव से भारत अपने पानी की हर बूंद का उपयोग आंतरिक विकास के लिए कर सकेगा।
सूखाग्रस्त क्षेत्रों के लिए आशा की किरण
इस प्रोजेक्ट का सबसे ज्यादा असर जम्मू-कश्मीर के कठुआ और सांबा जिलों पर पड़ेगा. ये क्षेत्र वर्षों से सूखे और पानी की कमी का सामना कर रहे हैं। मंत्री राणा ने स्पष्ट किया है कि बांध का काम 31 मार्च तक पूरा करने का लक्ष्य है, ताकि अगले सीजन में ही कंडी क्षेत्र के किसानों को सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी मिल सके.
परियोजना की विशेषताएं और लागत
शाहपुर कंडी बांध सिर्फ एक बांध नहीं है, बल्कि इंजीनियरिंग का एक अद्भुत कारनामा भी है:
कुल व्यय: लगभग ₹ 3,394.49 करोड़, जिसमें पंजाब सरकार का 80% और केंद्र सरकार का 20% हिस्सा है।
आयाम: बांध 55.5 मीटर ऊंचा है और इसमें 7.7 किमी लंबी जल विद्युत नहर है।
सिंचाई क्षमता: यह परियोजना पंजाब में 5,000 हेक्टेयर और जम्मू-कश्मीर में 32,000 हेक्टेयर से अधिक भूमि को सिंचाई लाभ प्रदान करेगी।
यह परियोजना जल-संप्रभुता की दिशा में एक मजबूत कदम है
इस परियोजना के पूरा होने से भारत न केवल अपनी कृषि क्षमता बढ़ा रहा है, बल्कि अपनी रणनीतिक स्थिति भी मजबूत कर रहा है। अब तक भारत के हक का पानी मुफ्त में लेने वाले पाकिस्तान को अब अपने जल भंडारण के लिए वैकल्पिक व्यवस्था के बारे में सोचना होगा। भारत के लिए यह परियोजना जल-संप्रभुता की दिशा में एक मजबूत कदम है।