पाकिस्तान का बलूचिस्तान प्रांत इस समय भीषण हिंसा और अस्थिरता के सबसे बुरे दौर से गुजर रहा है। पिछले एक सप्ताह में बलूच लिबरेशन आर्मी (बीएलए) और पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के बीच झड़पों में अनुमानित 145 विद्रोही मारे गए हैं। क्वेटा, ग्वादर और मस्तुंग जैसे जिलों में स्थिति इतनी गंभीर है कि इंटरनेट और परिवहन सेवाएं निलंबित कर दी गई हैं। लेकिन, जो धरती आज बंदूकों की आवाज से कांपती है, उसका इतिहास समृद्ध और शांतिपूर्ण रहा है।
प्राचीन हिंदू संस्कृति का केंद्र
आधुनिक इस्लामिक पहचान रखने वाला बलूचिस्तान सदियों पहले हिंदू, बौद्ध और पारसी संस्कृतियों का गढ़ था। इतिहास के पन्ने पलटने पर पता चलता है कि 7वीं शताब्दी में अरब आक्रमण से पहले यहां क्षत्रिय राजवंशों का शासन था। आज भी यहां खड़ा हिंगलाज माता का मंदिर (शक्तिपीठ) उस समय के हिंदू साम्राज्य के प्रभाव का जीवंत प्रमाण है। ऐसा माना जाता है कि देवी सती का ‘ब्रह्मरंध्र’ यहीं गिरा था। दुर्गम पहाड़ों में स्थित होने के कारण यह मंदिर कई आक्रमणों के बावजूद आज भी सुरक्षित है।
परिवर्तन का समय
परिवर्तन का दौर सातवीं शताब्दी के बाद इस क्षेत्र की धार्मिक और सामाजिक संरचना में तेजी से बदलाव आया। इस्लाम के प्रसार के साथ प्राचीन परंपराएँ लुप्त हो गईं। यह क्षेत्र, जो कभी व्यापार और संस्कृति का केंद्र था, आज पाकिस्तानी सरकार और अलगाववादियों के बीच लड़ाई का मैदान बन गया है।
आर्थिक पिछड़ेपन और सैन्य दमन के विरुद्ध संघर्ष
बलूचिस्तान के लोग आज आर्थिक पिछड़ेपन और सैन्य उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं। एक तरफ जहां हजारों साल पुराना हिंगलाज शक्तिपीठ आस्था का प्रतीक बनकर खड़ा है, वहीं दूसरी तरफ रोजाना होने वाला खून इस क्षेत्र की दयनीयता को दर्शाता है। बलूचिस्तान का इतिहास समृद्धि की बात करता है, जबकि उसका वर्तमान केवल विनाश की कहानी लिख रहा है।