मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और युद्ध की स्थिति ने वैश्विक अर्थव्यवस्था में हलचल पैदा कर दी है। यह स्थिति भारत के लिए दोहरी मार साबित हो सकती है, क्योंकि भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का 80% से अधिक आयात करता है। जब कच्चे तेल की कीमतें नियंत्रण से बाहर हो जाती हैं, तो देश की वित्तीय गणना बिगड़ने लगती है। इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर सरकार के संभावित कदम और निहितार्थ निम्नलिखित हैं:
महंगाई की चुनौती और आम जनता पर असर
कच्चे तेल की कीमत का सीधा असर पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर पड़ता है। जैसे ही डीजल की कीमत बढ़ती है, सब्जियों, अनाज और अन्य वस्तुओं के परिवहन की लागत बढ़ जाती है, जिसका बोझ अंततः उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ता है। तब डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर हो सकता है क्योंकि तेल खरीदने के लिए ज्यादा डॉलर चुकाने होंगे।
अब सरकार क्या कर सकती है?
इस संकट से निपटने के लिए सरकार के पास सीमित लेकिन प्रभावी विकल्प हैं उत्पाद शुल्क में कमी: अगर अंतरराष्ट्रीय कीमतें बहुत ज्यादा बढ़ती हैं तो सरकार पेट्रोल-डीजल पर उत्पाद शुल्क कम करके आम जनता को राहत दे सकती है। हालाँकि, इससे सरकार के कर राजस्व में कमी आती है। रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत ने रूस से सस्ता तेल खरीदा। सरकार फिर से उन देशों से बातचीत कर सकती है जो डिस्काउंट कीमत पर तेल उपलब्ध करा सकते हैं। सामरिक पेट्रोलियम भंडार: भारत के पास आपात स्थिति के लिए तेल का भंडार है। सरकार इन भंडारों से तेल निकालकर बाजार में आपूर्ति बनाए रखने की कोशिश कर सकती है। दीर्घकालिक समाधान के रूप में, सरकार तेल पर निर्भरता कम करने के लिए इथेनॉल मिश्रण और इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) पर अधिक जोर दे रही है।
भारत पर बड़ा संकट!
यह भारत के लिए न केवल आर्थिक बल्कि कूटनीतिक परीक्षा भी है। भारत के मध्य पूर्वी देशों (विशेषकर इज़राइल, ईरान और सऊदी अरब) के साथ अच्छे संबंध हैं। भारत अंतरराष्ट्रीय मंच पर शांति की अपील करके यह सुनिश्चित करने के लिए अपने प्रयास तेज करेगा कि आपूर्ति श्रृंखला बाधित न हो।
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