प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हालिया इजरायल यात्रा से वैश्विक राजनीति गरमा गई है. वह इजरायली संसद ‘नेसेट’ को संबोधित करने वाले पहले भारतीय प्रधान मंत्री बने। इस ऐतिहासिक क्षण ने भारत और इजराइल के संबंधों को नई ऊंचाई दी है, लेकिन साथ ही इस यात्रा को लेकर मुस्लिम देशों की मीडिया में तीखी प्रतिक्रिया भी आई है.
अपने संबोधन में तीन मुख्य स्तंभों पर फोकस किया
पीएम मोदी ने अपने संबोधन में तीन मुख्य स्तंभों पर फोकस किया. आतंकवाद, सांस्कृतिक एकीकरण और आर्थिक-तकनीकी साझेदारी का कड़ा विरोध। उन्होंने 7 अक्टूबर के हमास हमले को “बर्बर” बताते हुए इज़राइल के प्रति अपनी संवेदना व्यक्त की। 26/11 के मुंबई हमले को याद करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत की आतंकवाद के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति है और नागरिकों की हत्या को किसी भी परिस्थिति में उचित नहीं ठहराया जा सकता है।
वैश्विक मीडिया का विखंडन
इस दौरे पर अंतरराष्ट्रीय मीडिया बंटा हुआ नज़र आया.
इजरायली मीडिया: ‘‘द जेरूसलम पोस्ट’ जैसे अखबार ने पीएम मोदी की तारीफ करते हुए लिखा कि गांधी और नेहरू की विदेश नीति से हटकर भारत आज इजरायल को ‘लोकतंत्र की बहन’ मानता है. उन्होंने इसे 21वीं सदी की सबसे अहम साझेदारी बताया.
मुस्लिम देशों का मीडिया: यहां नाराजगी थी. अरब देशों की मीडिया ने पीएम मोदी के रुख को फिलिस्तीनी मुद्दे पर भारत की पारंपरिक नीति में बदलाव के रूप में देखा है। उन्हें लगता है कि भारत का झुकाव अब इजराइल की तरफ ज्यादा हो रहा है, जो फिलिस्तीनी संघर्ष को कमजोर कर सकता है.
पीएम मोदी की सॉफ्ट पावर
इजराइली विशेषज्ञों के मुताबिक, पीएम मोदी ने जानबूझकर अंग्रेजी में भाषण दिया ताकि उनका संदेश न सिर्फ इजराइल, बल्कि अमेरिका और खाड़ी देशों तक भी पहुंचे। उन्होंने योग और हिंदू-यहूदी संस्कृति के सामान्य मूल्यों का हवाला देकर ‘सॉफ्ट पावर’ का कुशलतापूर्वक उपयोग किया। इसके अलावा, उन्होंने IMEC (भारत-मध्य पूर्व-यूरोप कॉरिडोर) और I2U2 जैसे प्लेटफार्मों के माध्यम से क्षेत्रीय शांति और विकास की वकालत की।