अमेरिका के खिलाफ 31 सहयोगी? नाटो और ट्रंप के बीच बढ़ रहा तनाव

Neha Gupta
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आज तक यही माना जाता था कि अमेरिका के लिए सबसे बड़ा खतरा रूस और चीन हैं। लेकिन मौजूदा राजनीतिक हालात को देखते हुए ऐसा लग रहा है कि अमेरिका सबसे पहले अपने ही सहयोगियों से उलझ सकता है. ये सहयोगी देश नाटो के सदस्य हैं जिनकी कुल संख्या 31 है।

नाटो की स्थापना

नाटो की स्थापना 1949 में हुई थी। इसका मुख्य उद्देश्य सोवियत संघ के खतरे के खिलाफ यूरोपीय और उत्तरी अमेरिकी देशों की सुरक्षा सुनिश्चित करना था। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी जैसे देश नाटो के प्रमुख स्तंभ रहे हैं। नाटो को लंबे समय से दुनिया का सबसे शक्तिशाली सैन्य संगठन माना जाता रहा है।

अब स्थिति बदल गई है

लेकिन अब स्थिति बदल रही है. अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की कुछ नीतियों और बयानों के कारण नाटो और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ गया है। खासकर ग्रीनलैंड मुद्दे पर ट्रंप की धमकियों ने पूरे यूरोप में हलचल मचा दी है. ग्रीनलैंड डेनमार्क का हिस्सा है और डेनमार्क नाटो का सदस्य देश है।

बैठक में दी गयी चेतावनी

वाशिंगटन में हुई एक बैठक में अमेरिकी सांसदों ने चेतावनी दी कि अगर अमेरिका ने जबरन ग्रीनलैंड पर कब्जा किया तो यह नाटो के अनुच्छेद 5 का उल्लंघन होगा. इस लेख के अनुसार, यदि किसी एक नाटो देश पर हमला किया जाता है, तो इसे सभी सदस्य देशों पर हमला माना जाता है।

नाटो के बाकी देशों ने भी अमेरिका का विरोध किया

इसका मतलब यह है कि अगर अमेरिका डेनमार्क के खिलाफ सैन्य कार्रवाई करता है तो नाटो के बाकी देश भी अमेरिका के खिलाफ खड़े हो सकते हैं। कुछ नेताओं ने तो इस स्थिति को तृतीय विश्व युद्ध की शुरुआत भी मान लिया है। यूरोप के ज्यादातर नाटो देश इस मुद्दे पर एकजुट नजर आ रहे हैं. ब्रिटेन और फ्रांस जैसे देशों के पास भी परमाणु हथियार हैं। यदि अमेरिका अपने ही सहयोगियों के साथ संबंध खराब करता है, तो विश्व स्तर पर उसकी राजनयिक और सैन्य स्थिति कमजोर हो सकती है।

न सिर्फ सैन्य तौर पर बल्कि कूटनीतिक तौर पर भी बेहद अहम

नाटो न केवल सैन्य रूप से बल्कि कूटनीतिक रूप से भी अमेरिका के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। यूरोप और मध्य पूर्व में अमेरिका का प्रभाव काफी हद तक नाटो पर आधारित है। ऐसे में अमेरिका के लिए नाटो के खिलाफ संघर्ष आसान नहीं होगा. ये पूरी घटना दुनिया के लिए एक चेतावनी है. अगर तनाव बढ़ता रहा तो इसका असर सिर्फ अमेरिका या यूरोप तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया की शांति और सुरक्षा पर पड़ेगा।

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